स्मार्ट सिटी के तीन साल…1247 करोड़ के प्रोजेक्ट चल रहे हैं, आधे से ज्यादा तो पूरे भी हो गए कंट्रोल रूम स्मार्ट हुए, हम पर कोई असर नहीं
स्मार्ट पोल/ स्ट्रीट लाइट का 640 करोड़ का प्रोजेक्ट लेकिन पोल पर सिर्फ विज्ञापन, वाइफाई और एन्वायरर्मेंट सेंसर का तो पता ही नहीं
भोपाल। स्मार्ट सिटी की 25 जून को तीसरी सालगिरह है। भोपाल शहर को स्मार्ट बनाने के लिए 1247 करोड़ के प्रोजेक्ट चल रहे हैं। इसमें 600 करोड़ से ज्यादा तो खर्च भी हो चुके हैं। हालांकि शहर की तस्वीर में ज्यादा कोई बदलाव नहीं दिख रहा है। स्मार्ट पोल पर विज्ञापन जरूर झलकने लगे हैं लेकिन वो एन्वार्नमेंट सेंसर, वाई फाई जैसे दावे अभी तक तो हवाई ही लग रहे हैं। 300 करोड़ रुपए में तैयार हुआ कमांड एंड कंट्रोल सेंटर तो है लेकिन अब तक आम आदमी की तकलीफें दूर करने में कारगर नहीं हो सका है। 640 करोड़ के स्मार्ट पोल और स्ट्रीट लाइटों का भी जमीन पर असर नहीं दिख रहा है। 17 करोड़ के आईटीएमएस से ऑटो चालान जनरेट होने के दावे तो हो रहे हैं लेकिन हकीकत आप भी जानते हैं कि शहर की हर सड़क और चौराहे पर रोजाना पुलिस अफसर चैकिंग के नाम पर नगदी वसूल रहे हैं। इस सबके बावजूद स्मार्ट सिटी कंपनी के अधिकारियों का तर्क है कि भोपाल देश में रेट्रोफिटिंग मॉडल वाला इकलौता शहर है। उनका ये भी तर्क है कि टीटी नगर के 342 एकड़ हिस्से में एरिया बेस्ड डेवलपमेंट की पूरी तस्वीर तो 2020 तक ही साफ हो सकेगी। हालांकि अर्बन एक्सपर्ट इसकी वाइबिलिटी पर अभी से उंगली उठाने लगे हैं। पेश है स्मार्ट सिटी के अलग-अलग प्रोजेक्ट के दावे और हकीकत ….
आईटीएमएस-
(इंटेलीजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम)
खासियत- कैमरों से निगरानी
लागत- 17 करोड़ रुपए
दावा- ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने पर ऑटो चालान जनरेट हो रहे हैं।
हकीकत- स्पीड और ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के अलावा कोई चालान जनरेट नहीं हो रहे हैं। हर सड़क पर ट्रैफिक पुलिस के चैकिंग प्वाइंट लगे हैं। फिर ऑटो चालान का क्या मतलब।
आईसीसीसी
(इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर)
लागत- 300 करोड़ (सेंटर प्रदेश की सभी सात स्मार्ट सिटी के लिए है) भोपाल स्मार्ट सिटी का इसमें 43 करोड़ रुपए का शेयर होगा।
दावा- इससे शहर की 20 सेवाएं इंटीग्रेटेड है। कमांड सेंटर से इन पर कंट्रोल भी रखा जा सकता है।
हकीकत- दावे सिर्फ कंट्रोल रुम तक सीमित हैं। स्मार्ट डस्टबिन कहने को जुड़ी हैं लेकिन कॉलोनियों में कचरे का ढेर है। स्मार्ट पार्किंग में अभी तक कैमरे ही नहीं लगे हैं। पब्लिक बाइक शेयरिंग में दिन भर में चुनिंदा लोग ही राइड ले रहे हैं।
स्मार्ट पोल/ स्मार्ट स्ट्रीट लाइट
लागत- 640 करोड़ - पीपीपी मोड
दावा- स्मार्ट पोल में लाइट के अलावा एन्वायर्नमेंटल सेंसर, कैमरा, वाई-फाई और डिजिटल साइन बोर्ड भी होंगे।
हकीकत- 100 स्मार्ट पोल लग चुके हैं लेकिन किसी भी सेंसर और साइन बोर्ड नहीं दिख रहा है। हां, विज्ञापन जरूर हो रहा है।
स्ट्रीट लाइट
लागत- 640 करोड़ में ही शामिल है इसका भी बजट
दावा- शहर में 20 हजार स्मार्ट स्ट्रीट लाइट लगी है, इन पर कमांड सेंटर से नजर रखी जाती है।
हकीकत- भोपाल की कई सड़कें अंधेरे में है। जहां लाइटें लगी हैं, वहां भी बार-बार बंद-चालू होती है।
सोलर पैनल-
लागत- 1 करोड़ रुपए
दावा- आईएसबीटी में 35 किलो वॉट का सिस्टम लगा है। वीआईपी रोड किनारे 120 किलो वॉट का सिस्टम लगना है।
हकीकत- आईएसबीटी में सिस्टम शुरू नहीं हो सका है। वीआईपी रोड पर तो अभी काम भी शुरू नहीं हुआ है।
पब्लिक बाइक शेयरिंग-
लागत- 3 करोड़ रुपए पीपीपी मोड
दावा- 50 स्टेशन है, 300 से ज्यादा साइकिलें। 36 हजार रजिस्ट्रेशन हैं।
हकीकत- साइकिल स्टेशन के उपकरण टूट रहे हैं। ट्रैक पर गड्ढे और अतिक्रमण हैं। रोजाना गिने-चुने राइडर ही इस्तेमाल कर रहे हैं।
स्मार्ट रोड- पालीटेक्निक से भारत माता चौराहा
लागत- 27 करोड़ रुपए
दावा- शहर की पहली ऐसी रोड होगी जो तमाम सुविधाओं से लैस होगी। 90 फीसदी काम पूरा हो चुका है
हकीकत- मई में ट्रैफिक शुरू होना था लेकिन अब तक तारीख तय नहीं हो सकी है। स्मार्ट पोल पर वाई-फाई भी कनेक्ट नहीं हो रहा है न ही एन्वायर्नमेंट सेंसर काम कर रहे हैं।
बोलेवर्ड स्ट्रीट- प्लेटिनम प्लाजा से जवाहर चौक
लागत- 20 करोड़ रुपए
दावा- यह जर्मनी की तरह की सड़क होगी, जो शहर को अलग पहचान देगी।
हकीकत- अभी सिर्फ टेंडर हुए हैं लेकिन काम जमीन पर नहीं दिख रहा है।
सरकारी आवास- टीटी नगर में
लागत- 200 करोड़ रुपए फर्स्ट फेज में
दावा- पहले फेज में 680 सरकारी आवास बनने हैं। इसके लिए टेंडर हो चुके हैं।
हकीकत- जमीन पर काम नहीं दिख रहा है।
अर्बन टेक्टेनाइजेशन- ज्योति टॉकीज से बोर्ड ऑफिस चौराहा
लागत- 6 करोड़ रुपए
दावा- सड़क की चौड़ाई बढ़ाकर सिटी बस टर्मिनस भी यहीं बनाएंगे।
हकीकत- डेढ़ साल पहले इसका भुमिपूजन हो चुका है लेकिन काम अब तक गति नहीं पकड़ सका है।
प्लेस मेकिंग-
लागत- 10 करोड़ रुपए
दावा- अरेरा कॉलोनी ई-1 और शक्ति नगर में पार्क के अलावा न्यू मार्केट में स्मार्ट स्ट्रीट
हकीकत- न्यू मार्केट में अभी काम शुरू नहीं हुआ है। ई-1 पार्क के लिए टेंडर हो चुके हैं।
सदर मंजिल- हेरिटेज प्रोजेक्ट
लागत- 5 करोड़ रुपए
दावा- शहर की पुरातत्व महत्व की इमारतों को संवारा जाएगा।
हकीकत- पहले फेज में दो करोड़ खर्च करने के बाद भी सदर मंजिल आकर्षण का केंद्र नहीं बन सकी है। अब सेकेंड फेज में 3 करोड़ और खर्च होंगे।
भोपाल प्लस एप
लागत - 4 करोड़ रुपए
दावा- अलग-अलग तरह की नागरिक सुविधाएं को एक ही प्लेटफॉर्म पर लाया गया है।
हकीकत- अब तक सिर्फ 36 हजार डाउनलोड हुए हैं, बहुत कम लोग ही आनलाइन सेवाओं का लाभ ले पा रहे हैं।
स्मार्ट सिटी बिल्डिंग-
लागत- 8 करोड़ रुपए
दावा- शहर की अपनी तरह की अलग बिल्डिंग, जिसमें एक ही छत के नीचे पूरे प्रदेश का कमांड सेंटर मौजूद है।
हकीकत- बिल्डिंग जरूर बन गई है लेकिन स्मार्ट सिटी का दफ्तर अब भी पुरानी बिल्डिंग में ही है।
मिथेनाइजेशन प्लांट- बिट्टन मार्केट में
लागत- 1 करोड़ रुपए
दावा- गीले कचरे से बिजली बनाने के लिए शहर का पहला संयंत्र।
हकीकत- प्लांट के लिए गीला कचरा ही नहीं मिल पाता।
इन्क्यूबेशन सेंटर-
लागत- 5 करोड़
दावा- युवाओं को स्टार्ट अप शुरू करने के लिए उनके आइडिया पर ट्रेनिंग और बैंक से लाेन लेने की प्रक्रिया बताएंगे।
हकीकत- अब तक इन्क्यूबेशन सेंटर के माध्यम से कोई भी स्टार्टअप शुरू नहीं हो सका।
एक्सपर्ट कमेंट-
शहरों के लिए करोड़ों रुपए के प्रोजेक्ट प्लान करते समय हमें इसकी फिजिबिलिटी से ज्यादा वाइबिलिटी रिपोर्ट बनाने पर ध्यान देना होगा। ताकि यह तो पता चले कि प्रोजेक्ट बनने के बाद यह वाइबल होगा भी या नहीं। मुझे लगता है कि भोपाल में इतने महंगे प्रोजेक्ट को वाइबल करने के लिए अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत होगी।
प्रदीप सक्सेना, रिथिंकिंग अर्बनिज्म अ स्टेप्स टुआर्ड्स गोल्डन एरा के लेखक
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भोपाल में अभी तो बुनियादी सुविधाएं ही पूरी नहीं मिल पा रही है। कॉलोनियों में कचरा जमा है, पाइपलाइन में लीकेज है। ट्रैफिक के हालात डरावने हैं। ऐसे में पहली जरूरत है, अलग-अलग एजेंसियों को इंटीग्रेटेड करके स्मार्ट सिस्टम बनाने की, ताकि स्मार्ट तरीके से काम हो सके। इसके लिए जरूरी है कि एक ही एजेंसी पूरे शहर के निर्माण कार्यों पर निगरानी रखे।
भीष्म कुमार चुघ, रिटायर्ड डीजी, सीपीडब्ल्यूडी
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